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Saturday, 24. December 2016 - 13:00 Uhr

टुकड़ा कागज़ का : लघुता में विराटता - वीरेंद्र आस्तिक


लघुता में विराटता - वीरेंद्र आस्तिक


बात डॉ  नगेन्द्र के कथन से शुरू करता हूँ। वे कहा करते थे- ‘स्थापितों का मूल्यांकन और उनकी व्याख्या तो बार-बार हो सकती है, उनकी आलोचना भी बार-बार हो सकती है, किन्तु उन पर शोध् नहीं। शोध् तो अज्ञात को ज्ञात करना है। उपेक्षितों को स्थापित करना है।’ डॉ नगेन्द्र की बात मेरी समझ में भी आई। हमारे साहित्य समाज मंे और शैक्षिक संस्थानों में तो स्थापितों को ही बार-बार स्थापित किया जाता है। ऐसे ही वातावरण से ऊबकर कभी नामवर जी ने भी कहा था- ‘विश्वविद्यालय और शैक्षिक संस्थान प्रतिभा घोंटू संस्था में बदल चुके हैं।’ बहरहाल ऐसी अवधरणाओं को मान्य ठहराते हुए  डॉ विमल ने एक महत्वपूर्ण शोध् करवाया, अनुसंधता थीं डॉ शकुंतला राठौर। उन्होंने छायावाद के लगभग 36 गौणकवियों का अनुसंधन किया। इस शोधकार्य द्वारा छायावाद की कई पूर्व स्थापनाएँ निरस्त हुईं और कई पर नई रोशनी पड़ी, जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा डॉ नगेन्द्र और नामवर जी दोनों ने की। 
 
कहना चाहूँगा कि युवा रचनाकार ही सबसे अध्कि उपेक्षित होते हैं। युवा रचनाकारों के उपेक्षित होने का अर्थ है- हम स्थापित और मान्य अवधरणाओं की सहूलियत के आगे मौलिक और नवीन चेतना पर बात करने की जहमत उठाना नहीं चाहते। डॉ विमल ने जहमत उठाई तो कुछ युवा और गौण रचनाकार स्थापित हुए, साथ ही शोध् संस्थानों की जड़वत परम्परा भी टूटी। लेकिन यह सफलता तब तक एक अपवाद ही मानी जाएगी, जब तक ऐसे शोध् कार्य प्रचलन में न आ जाएँ। 
 
किसी युवा रचनाकार के पहले काव्य संग्रह से गुजरने के बाद जेहन में इतिहास के उपरोक्त प्रसंगों का ताजा हो जाना कृति के प्रति एक सार्थक संकेत ही है। साहित्य में युवा रचनाकारों का पैर- जमाऊ कार्य मुझे आश्वस्त करता रहा है। मैंने देखा है, अपार-अगम भ्रष्टाचारी दलदल के बीच कम उम्र का साहस। कामयाबी के संघर्ष में एक-एक पंखुड़ी को जोड़ते हुए कमलवत होने की अभीप्सा को जीवित रखना कोई आसान कार्य नहीं। लेकिन हैं ऐसे साहित्य समर्पित सिपाही जिनका गीत प्रादुर्भूत होता है- नोन, तेल, लकड़ी से लेकर साहित्य, शिक्षा और नौकरी तक के आसन्न संकटों के बीच। 
 
ऐसे ही युवा रचनाकार हैं अवनीश सिंह चैहान। अवनीश की पाण्डुलिपि जब मेरे पास आई तो कृति-शीर्षक ही देखकर मन विस्मय से भर उठा- ‘टुकड़ा कागज़ का।’ यह ‘टुकड़ा कागज़ का’ मुझे दिखाने लगा सपनों की दुनिया। तत्क्षण मैंने पहले यही गीत पढ़ा। आह! ‘टुकड़ा कागज़ का।’ यह एक रूपक गीत है। यह उस लाखैर आदमी की भुक्त-कथा है जो क्रूर समय के थपेड़ों की मार झेल रहा है। यह गीत शोषकों पर व्यंग्य भी है, किन्तु अन्तिम पंक्तियाँ जिस विराट बिम्ब का सृजन करती हैं- सोचने पर विवश कर दिया- 
 
कभी कोयले-सा धधका 
फिर राख बना, रोया 
माटी में मिल गया 
कि जैसे 
माटी में सोया 
 
चलता है हल 
गुड़ता जाए 
टुकड़ा कागज़ का। 
 
साधरण चीजों में दैवीय और महनीय गुणों को देखने की दृष्टि ने मुझे चैंका दिया। कवि की आंतरिक तबियत को जानने की उत्कंठा से मैं कृति को आद्योपांत पढ़ गया। विस्मय की बात यह रही कि पाठ के दौरान महाप्राण निराला कहीं-कहीं ताल देते जा रहे थे। शब्दस्फुरण में महान आदर्शों का स्मरण कराने की शक्ति होती है। निराला जी लघु में विराट को देखने के लिए लघुतर होते जाने की जिस साधना पर जोर देते हैं, वो वास्तव में शक्ति की साधना ही है। निराला जी कहते हैं- तुम अपने में सूक्ष्म (लघु) को देखने की शक्ति का संचार करो। जिस प्रकार आँखों के तिल में पूरा आकाश समा जाता है, गागर में सागर समा जाता है- 
 
आँखों के तिल में दिखा गगन 
वैसे कुल समा रहा है मन 
तू छोटा बन, बस छोटा बन 
गागर में आएगा सागर। (आराधना से) 
 
निराला की तमाम रचनाओं में लघु का विराटीकरण पूरे परिदृश्य के साथ उपस्थित हुआ है, लेकिन दूसरी तरफ शोषक और शोषित का वर्तमानीकरण भी हुआ। ‘राम की शक्ति पूजा’ और ‘कुकुरमुत्ता’ सर्वोत्तम उदाहरण हैं। निराला छोटे आदमी को वहिर्जगत के द्वन्दों में नहीं झोंकना चाहते। वहाँ तो वह सामंतों-शोषकों से मात खा ही रहा है। उस पूरी व्यवस्था के विकल्प में उनका मानना है कि लघु और विराट के द्वन्द्वात्मक संबन्ध् की ऊर्जा को यदि छोटा आदमी अपने भीतर संजोएगा तो एक दिन वह शक्तिशाली हो उठेगा। आणुविक थ्योरी के अनुसार लघु संपूर्ण (विराट) का एक घटक ही है। जैसे ब्रह्माण्ड के घटक हैं, ग्रह-नक्षत्र आदि। ‘तू छोटा बन, बस छोटा बन’, अर्थात् लघु से लघुतर होते जाना एक व्यंजनात्मक संकेत है, उसी आणुविक थ्योरी की ओर। लघुकण का सबसे सूक्ष्मकण ‘परमाणु’ होता है, जिसके बनते ही वह परमशक्तिशाली हो उठता है। 
 
अवनीश चैहान के सृजन में उपरोक्त तत्वों के संकेत हैं, जहाँ उनकी काल्पनिक, भावुक और नैसर्गिक शक्तियों का, यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में समाजीकरण हुआ है। कहना चाहूँगा कि शक्ति का विलय (‘राम की शक्ति पूजा’ आदि के संदर्भ में) महाशक्ति में होना ही निराला का महाप्राण होना है। यहाँ ‘टुकड़ा कागज़ का’ अन्ततः मिट्टी में गुड़कर महाशक्ति में एक लय हो विलीन हो जाता है। 
 
इसी प्रकार कवि के कुछ गीतों में ‘दूब’ और ‘तिनका’ जैसी अति सामान्य चीजें असामान्य बनकर विराट बिम्ब का सृजन करती हैं। इन विषयों पर मेरे संज्ञान में आए अब तक के गीतों में ये गीत श्रेष्ठ लगते हैं। ‘एक तिनका हम’ की मानवीयता हमंें झकझोर देती है। ऐसे गीतों में कवि की अनुभूति उसके कष्ट-साध्य संघर्षों से सघन हो गई है। यहाँ भी निरीह और दलित व्यक्ति का प्रतीक है तिनका। इस शब्द की गहनतर अर्थमीमांसा हुई है गीत में, जिसकी सविस्तार व्याख्या अपेक्षित है। अन्तिम पंक्तियों में वह तिनका कह उठता है- 
 
साध् थी उठ राह से 
हम जुड़ें परिवार से 
आज रोटी सेंक श्रम की 
जिंदगी कर दी हवन। 
 
एक तिनके (निरीह व्यक्ति) का यह उत्सर्ग क्या गीत को कालजयी नहीं बनाएगा? गज़ब का गीत है, गज़ब की कविता है यह। 
 
आज हमारे सामने जिजीविषा की जो वैश्विक चुनौतियाँ हैं। हमारे समाज की और समाज के निचले से निचले स्तर की समस्याओं के जो प्रतिरोध् हैं और उनके जो भविष्य-बोध् हैं उस पूरे लोक पर अवनीश की दृष्टि है। यहाँ इस पुस्तक द्वारा उठाए गए सभी पक्षों पर बात संभव नहीं, पर हाँ, इस कृति के लिए जो ज्यादा जरूरी है, उस पर अपनी राय अवश्य रखने का प्रयत्न कर रहा हूँ। 
 
कवि के गीतों में आधुनिकता-बोध् की प्रखरता है। यह दूसरी बड़ी विशेषता है। आधुनिकता को स्थापित करने में सबसे पहले युवा वर्ग ही आगे आता है जो स्वाभाविक ही है। नवगीत पर विचार करने से पहले हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सही मायने में नवगीत एक आधुनिक अवधरणा है, जिसकी जड़ें हमें नवजागरणकाल से जोड़ती हैं। जहाँ हमारी वस्तुपरकता और तथ्यपरकता में तीव्रता आती है और हम पहले से ज्यादा विज्ञान सापेक्ष और समय सापेक्ष होते चले जाते हैं। नव-जागरणकाल की अवधरणा के साथ साहित्य का भी मुख्य तत्व था स्वातंत्रयबोध्, जिससे हमारे जीवन के सभी सरोकार प्रभावित होते गए। हिन्दी साहित्य में नवजागरणकाल से प्रभावित होने वाले पहले कवि हैं महाप्राण निराला। इसलिए मैं निराला को पहला क्रान्तिकारी आधुनिक कवि मानता हूँ। 
 
दुर्भाग्य से हमारे देश में ‘आधुनिकता’ शब्द यूरोप के ‘मॉडर्निटी’ शब्द का पूरी तरह से पर्याय नहीं बन पाया। उत्तर आधुनिकतावाद भी नहीं। वह मूल्यों को और भी विक्रत कर रहा है, समाज में और साहित्य में भी। यह संग्रह हमें आधुनिकता का प्रमुखता से दो रूपों में अवलोकन कराता है- आधुनिकता का एक अर्थ है जो हमें स्वतंत्रता, संयम, वैज्ञानिकता, तार्किकता, भविष्यधर्मिता और संलक्ष्यता आदि का बोध् कराता है। दूसरी तरफ वह फैशन तथा फैशन के रूप में ओढ़ी हुई अंग्रेजियत, अपसांस्कृतिकता, अनैतिकता और अंधविश्वास आदि को अर्थ देता है। यह दूसरे प्रकार का जो आधुनिकताबोध् है वही हमारे समाज को और हमारी बाल और युवा पीढ़ी को उच्श्रृंखल और मिथ्याचारी बना रहा है अर्थात् आधुनिकता शब्द की सही व्यंजना और सही हनक-धमक को खण्डित कर रहा है। टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलने से, जीन्स शर्ट-टाई पहनने से और पिता की कमाई को क्लबों- होटलों में बहाने से कोई मॉडर्न नहीं बन जाता। गैरिक वस्त्र धरण कर और सन्यासी होकर भी विवेकानंद मॉडर्न थे। धर्म के पृष्ठाधर पर आधुनिकता के प्रथम उद्घोषक हुए हैं विवेकानंद और उसके बाद 20 वीं शती में ओशो एवं प्रभात रंजन सरकार। 
 
अवनीश के अधिकांश गीतों में उपरोक्त परिदृश्य का कथ्य अभिव्यक्त हुआ है। हर युग के अपने-अपने पाखंड और अंधविश्वास हो जाते हैं। सनातन मूल्य युग की गर्द से जो थोड़े धूमिल दिखाई देने लगते हैं, उस गर्द को झाड़ना ही आधुनिक होना है। कबीर अपने समय के सबसे बड़े आधुनिक हुए। मानवतावादी हुए। उनके युग में छुआछूत और मूर्तिपूजा का बोलबाला था। उन्होंने एक दोहा प्रचारित कर उस कुलीनवादी परम्परा को चुनौती दे दी जो हज़ारों वर्षों से आरूढ़ थी। आधुनिकता (ज्ञान-विज्ञान) की एक चिंगारी ने अंधविश्वास पर चोट ही नहीं की, साधरणजनों का हृदय परिर्विर्तत कर दिया और अस्पृश्यों के लिए ज्ञान मार्ग का द्वार खोल दिया- 
 
पाहन पूजैं हरि मिलैं तो मैं पूजूँ पहार 
वा ते वो चाकी भली, पीस खाय संसार। 
 
अवनीश भी फैशनपरस्ती पर चोट कर रहे हैं, लेकिन अपनी नई शैली में। आज फैशन और मिथ्याचरण ने हमको हमारे निष्ठ-नैसर्गिक और स्वाभाविक जीवन से अलग-थलग कर दिया है। पशु-पक्षी भी हमारे रूखे व्यवहार से हतप्रभ हैं। गर्भवती गौरैया घोंसला बुनने की उचित जगह न मिलने पर गर्भपात जैसी दर्दनाक समस्या से जूझ रही है। मोबाइल-लैपटॉप स्टेटस ने घर-परिवार की रागात्मकता को सोख लिया है। कामुक पॉप-धुनों और कैटवाक की अधीन सभ्यता छद्म सम्मोहन और वाक् चातुर्य वशीभूत युवा पीढ़ी अपनी ज़मीनी सात्विकता से विमुख हो भटक रही है। विद्यार्थी-गण कॉलेज में जोड़-तोड़ से उत्तीर्ण हो भी गए तो प्रतिस्पर्ध में निराश-निरूपाय हो अपराधवृत्ति का विकल्प चुन रहे हैं। किशोरावस्था में ही दैहिक वर्जनाएँ टूट रही हैं। फैशन के रूप में टेलिविजनी आधुनिकता ने बच्चों पर बुरा असर डाला है। माँ हैरान है- 
 
टॉफी, बिस्कुट, पर्क, बबलगम 
खिला-खिला कर मारी भूख 
माँ भी समझ नहीं पाती है 
कहाँ हो रही भारी चूक 
 
माँ का नेह मनाए हठ को 
लिए कौर में रोटी-साग। 
 
रचनाकार अपने तमाम गीतों में कथित फैशनपरस्ती के बरक्स व्यक्ति में कर्तव्यबोध् को जगाने का प्रयत्न करता दिखाई देता है। ‘बदला अपना लाल’ में ‘समय सुई है’ का सांकेतिक प्रयोग और मिथक के रूप में ‘कबीर’ दोनों मिलकर लक्ष्यार्थ का बोध् कराते हैं- 
 
तकली में अब लगी रुई है 
कात रहा है, समय सुई है 
कबिरा-सा बुनकर बनने में 
लगते कितने साल? 
 
कथित फैशन अब नहीं चलने वाला। यह कवि का आत्मविश्वास है। क्योंकि- ‘लाख-भवन के आर्कषण में/ आखिर लगती आग।’ इस तरह संग्रह के अनेक गीतों में कवि का मनोभाव और विवेक संवादरत है, जैसे ‘मन का तोता’, ‘रस कितना’ और ‘साधे मन को’ आदि गीतों में भावना और बुद्धि का सोद्देश्यात्मक समंजन हुआ है। 
 
रचनाकार की कुछ रचनाएँ हमें उस गहरे बोध् से जोड़ती हैं, जहाँ आधुनिकता अपने वैभव में अहममन्य हो गई है। गौर करें, हिन्दी साहित्य के जितने भी काल खंड- प्रयोगशीलता, प्रगतिशीलता, समकालीनता एवं उत्तरआधुनिकता आदि, आधुनिकता के घटक ही तो हैं। ये सभी घटक उसी-नवजागरण काल से नालबद्ध हैं। किन्तु जरा विचारिये- भूमंडलीकरण आया तो वह उपरोक्त सभी वैचारिक अवधरणाओं को नेस्तनाबूद करने के लिए आया, यानी पूरे साहित्य को खत्म करने के लिए आया। भूमंडलीकरण भी आधुनिकता की ही अवधरणा है। ऐसा आधुनिकतावाद जिसमें पूँजीवाद का वैज्ञानिकीकरण हुआ है। बाज़ार जिसकी आत्मा है और विज्ञापन छोटा भाई। कवि की दृष्टि भूमंडलीकरण के एक-एक अंग पर गई है। उसने हर एक दृश्य का अंतर्मंथन किया है- ‘विज्ञापन की चकाचैंध्, ‘बाज़ार समंदर’, ‘पंच गाँव का’ और ‘उसका खाता’ आदि सृजित वस्तुस्थितियों पर तनिक विचार करें। क्या हमारे देश की आधुनिकता का एक विद्रूप भाग बनकर नहीं रह गया है भूमंडलीकरण? जरा इसकी दबंगई देखिए- 
 
हमें न मँहगाई की चिन्ता 
नहीं कि तुम हो भूखे-प्यासे 
तुमको मतलब है चीजों से 
हमको मतलब है पैसा से 
 
तुम पूरा बाज़ार उठा लो 
उबर न पाओ खर्चों से 
 
सभ्यता तो वर्तमान होती है। संस्कृति उसके सकारात्मक अंशों को स्वीकार कर खुद को परिवर्तित और समृद्ध करती है। यह सिद्धान्त भूमंडलीय औपनिवेशिकता के प्रभाव और दबाव में लगभग टूट चुका है, क्योंकि औपनिवेशिक सभ्यता ने तरह-तरह के कीर्तिमानी प्रलोभनों का जाल फैला दिया है हमारे समाज पर। विश्व के शिखर पर पहुँचने की प्रतियोगिताएँ, देशी ठसक और धमक को घृणा में बदल रहीं हैं। एक गणना के अनुसार पचास प्रतिशत युवा प्रतियोगियों को इस कथित रेस से बाहर कर तनावयुक्त और बीमार कर दिया गया। कई तो आत्महत्या के शिकार भी हुए। इसलिए मेरा समझना है कि वैचारिक स्तर पर हम न गाँधीवादी रहे और न मार्क्सवादी। ऐसे में उत्तर आधुनिकतावाद में बराबरी और सामाजिकता ढूँढना कहाँ की समझदारी है? वहाँ का पूँजीवाद एक व्यक्तिवादी अवधरणा ही नहीं बल्कि व्यक्तिवाद को भी व्यक्तिगत बनाते हुए, उससे काम निकालने की एक शैली बन गया है। अर्थ-शक्ति की हवश ही पूंजीवाद का असलीरूप है। अवनीश के गीतों में उपरोक्त ध्वनित होता है। 
 
ये गीत बोध् कराते हैं कि भूमंडली-तंत्र कैसे-कैसे सूक्ष्म रूपों में हमारे भीतर प्रवेश कर रहा है। यानी हमारी कार्यशैली को हमारे विरुद्ध करके हमारी ही थाती का अवमूल्यन रचा जा रहा है। गाँवों-शहरों में एक अदृश्य कुंठाभाव कहीं घर कर रहा है। गाँव और शहर आमने-सामने होकर खण्डित मानसिकता जी रहे हैं। एक गीत है- ‘गली की धूल’, विसंगति का मार्मिक चित्र। कवि की मनोदशा अचरज में डाल देती है। गाँव से पलायन होकर शहर में आए व्यक्ति ने क्या पाया और क्या गँवाया, का विश्लेषण आसान नहीं है। गीत की अंतर्वीथियाँ हमें दूर-दूर तक ले जाती हैं। पूरा गीत उद्धृत करने योग्य है, यहाँ अन्तिम पंक्तियाँ- 
 
बुढ़ाए दिन, लगे साँसें गवाने में 
शहर से हम भिड़े सर्विस बचाने में 
कहाँ बदलाव ले आया 
शहर है या कि है अजगर? 
 
संग्रह के भीतरी अवलोकनों के बीच-बीच में एक पाठक की उत्कंठा यह जानने की अवश्य रहती है कि यह कवि अपने संग्रह के बाहर कैसा होगा। मेरा मानना है कि समाज का आदर्श वही कवि बनता है जिसका व्यक्तित्व और कृतित्व पारदर्शी हो। व्यक्ति के अंतर्वाह्य जगत को उसकी प्रतिभा ही संतुलित करती है। कहा जाता है कि प्रतिभा व्यक्ति में जन्म के साथ आती है। और परिवेश संस्कारी हो तो साधनाएँ बचपन से ही शुरू हो जाती हैं। सन् 1893 में शिकागो (अमेरिका) में युवा विवेकानंद ने उद्भुत भाषण देकर विश्व में हिन्दुत्व का परचम लहरा दिया था। उन्तीस वर्षीय पी॰बी॰ शैली ने अज्ञात लेखक के रूप में ईश्वर के विरुद्ध हो जाने को आवश्यक मानते हुए एक किताब लिखी और छपवा डाली। महत्वपूर्ण प्रसंग यह है कि उस कृति की ख्याति ने उन्हें ऑक्सफोर्ड से निष्कासित करवा दिया। 15 वर्षीय नेपाली अपने पहले ही कवि सम्मेलन से विख्यात हो गये थे। मंच पर उपस्थित कथा-सम्राट प्रेमचंद्र ने कहा था- ‘बरखुरदार, कविता क्या पेट से सीखकर आए हो।’ यह सब प्रतिभा के ‘चरैवेति’ प्रभाव के अंतर्गत है। जैसे जल-समूह की गत्यात्मक शक्ति धरा फोड़ लेती है, वैसे ही प्रतिभा मील-स्तम्भ बनाती जाती है और आगे चलती चली जाती है। एक और सूत्र कथन याद आ रहा है। डॉ शन्तिसुमन के गीतों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कभी डॉ विजेन्द्र नारायण सिंह ने कहा था- ‘प्रतिभा की एक पहचान यह है कि वह विकसनशील होती है।’ हमारे प्रिय अवनीश ऐसे ही प्रतिभाशाली कवि-लेखक हैं। एम॰ फिल॰ (अंग्रेज़ी) करते ही मात्र 24 साल की उम्र में एक अंग्रेज़ी किताब (स्वामी विवेकानंद: सिलेक्ट स्पीचेज) लिख डाली, जो परास्नातक पाठ्यक्रम में कई विश्वविद्यालयों में पढ़ी-पढ़ाई गयी। एक विश्वविद्यालय में कार्यरत् अंग्रेजी- प्राध्यापक अवनीश चैहान हिन्दी के क्षेत्र में आए तो मात्र 6-7 साल की अवधि में ही जो भी गद्य-गीत लेखन और संपादन कार्य किया, वह सराहा गया। आजकल वे अनेक छोटी-बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में छप रहे हैं। गत 2-3 वर्षों में इण्टरनेट पर ‘पूर्वाभास’ जैसी पत्रिका निकालकर उन्होंने विशेष ख्याति अर्जित की है। हर्ष का विषय ही है कि इस कवि की कार्यशैली विश्वस्तर पर भी सम्मानित/ पुरस्कृत हो चुकी है। साहित्यिक दौड़ में  अभी तो इस धवक ने दशक भी पार नहीं किया किन्तु उसकी कविता का यह वामन रूप मेरे जैसे उम्रदराजों को चकित कर देने के लिए काफी है। इस अवांतर प्रसंग के बाद हम पुनः संग्रह के भीतरी लोक में लौटते हैं। 
 
संग्रह में कतिपय प्रेम-गीत और नदी-गीत भी समायोजित किए गए हैं। नवगीत के कुछ घिसे-पिटे प्रतीक शब्दों में ‘नदी’ भी एक है। नवगीतकारों ने नदी का मानवीकरण किया है। नदी-गीतों में डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया का गीत सर्वश्रेष्ठ माना गया है- ‘नदी का बहना मुझमें हो’- मेरा स्वभाव नदी जैसा हो जाए। यह स्व से सर्व होना है, सर्ग से निसर्ग होना। व्यक्ति का नदी के रूप में अवतरण अर्थात् बंजर-भूमि, घड़ियाल और गागर आदि सबके लिए समानधर्मा हो जाना है। यही रचनाकार की आंतरिक क्रान्ति है। यह सचेतन जीवन-साधना-सिद्धि है, साधुता है। अवनीश कहते हैं- ‘पंख सभी के छुएँ शिखर को/ प्रभु दे, वह परवाश।’ कवि के नदी-गीत अत्यंत सामाजिक हैं। उसके गीत भी ‘मैं’ शैली में हैं। युगीन विदू्रपताओं से अतिक्रान्त हो, वह भी स्व से सर्व हुआ है। युगीन शोषण से नदी भी नहीं बच पाई। वह प्रदूषित तो हुई ही, सूख भी गई है। कवि स्वयं गल-गल कर नदी की धर बनना चाहता है। एक-दूसरे गीत में कवि को नदी के रूप में सागर (अन्तिम सत्य) को वरण करना है। तो जरूरी है वह तप जो सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त करा दे। बड़ी बात है। साहित्य के लिए और मोक्ष के लिए भी। मैंने देखा है कवि को। आचरण में भोले और साधना  में नीलकंठी। द्रवणशीलता उसके संस्कारी गुणों में शामिल है। यदि ऐसा न होता तो ये पंक्तियाँ जेहन में कैसे आ पाती- 
 
नाव चले तो मुझ पर ऐसी 
दोनों तीर मिलाए 
जहाँ-जहाँ पर रेत अड़ी है 
मेरी धार बहाए 
ऊसर-बंजर तक जा-जाकर 
चरण पखार गहूँ मैं। 
 
या 
 
वरण करेंगी कभी सिन्धु का 
पूर्वाग्रह सब तोड़ के। 
 
प्रेम-गीतों को पढ़ लेने के बाद मुझको यह आभास हुआ कि कवि ने बुहत से प्रेम-गीत लिखे होंगे, उनमें से ये पाँच गीत चयनित किए हैं। ऐसा शायद इसलिए हुआ होगा, कि प्रेम-बिम्ब को साधने में प्रायः भंगिमाओं-संवेगों की फिसलन अधिक हुआ करती है, जिससे रचना में हृदय और बुद्धि का संतुलन डगमगा जाया करता है। ऐसा लगता है कि अवनीश ने इस संग्रह में अपनी रचनात्मकता का सर्वोत्तम परोसा है। इन गीतों में उनके कौशल्य और प्रावीण्य का पूरा योग है। 
 
एक रचनाकार अपने भावात्मक, कल्पनात्मक, दृश्यात्मक और ज्ञानात्मक अभिगमों के द्वारा अपनी मूल कथ्यवस्तु को प्रभामंडित करने में जिस भाषा को मेरुदण्ड बनाना चाहता है, उसकी संतुष्टि से ही एक रचना होती है- एक गीत होता है। भाषा ही वह ‘रेसिपी’ है जहाँ अर्थों-भावों के सारे रस अपने में विलीन कर अस्वादन को अद्वितीय बना देती है जैसे मधुमक्खी विभिन्न प्रकार के पुष्प-रसों को मधु में रूपान्तरित कर देती है। गीत के सन्दर्भ में प्रेम की विविध् परिभाषाएँ हैं। उन सभी को जेहन में रखते हुए मैं कहना चाहूँगा कि प्रेम और ईश्वर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों का केन्द्र है गीत-सृष्टि। डॉ सुरेश गौतम का सूत्र कथन है- ‘गीत (प्रेम) अध्यात्म है, तपश्चर्या है। गीत नीलकंठी द्रव है’। 
 
दुनिया में दो ही अस्तित्व ऐसे हैं जिनका साहित्य सर्वोपरि है। एक है ईश्वर और दूसरा प्रेम। दोनों अव्यक्त हैं। दोनों का साहित्य आज तक पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सका। दोनों ‘शायद’ पर अवलम्बित हैं। प्रेम में गहरे डूबे हुए किसी प्रेमी से पूछो- ‘आप ने प्रेम को जान लिया? उसका उत्तर होगा- ‘शायद’। स्यात्वाद के प्रवर्तक भगवान बुद्ध से पूछा गया- ‘क्या ईश्वर है?’ उनका उत्तर था- ‘शायद’। अवनीश के पाँच प्रेम-गीतों का संचारी भाव प्रकृत है, तथापि ये गीत श्रेष्ठ हैं। कई गहनतम हैं, जहाँ दृश्य और द्रष्टा अभेद्य हो जाते हैं। शायद प्रेम की गहनतम अनुभूति का रस उन्होंने चख लिया है। ‘एक आदिम नाच’ का तो यही संकेत है- 
 
एक स्मित रेख तेरी 
आ बसी जब से दृगों में 
हर दिशा तू ही दिखे है 
बाग़-वृक्षों में, खगों में 
 
दर्पणों के सामने जो बिम्ब हूँ 
वो मैं नहीं- कादम्बरी तू! 
 
मेरी राय में ऐसे गीत व्याख्यातीत होते हैं। यहाँ यह भी स्मरण में रखना होगा कि कवि अपने गीतों में जिस विराट-बिम्ब और मानवीय चेतना की बात उठाता है उन सब का मूलाधर उसकी प्रेम-शक्ति ही है। 
 
कृति के अवगाहन में विविध् कथ्यालोकों ने मुझे अप्रत्याशित रूप से प्रभावित किया है। उन सबों पर बात होनी चाहिए। पर यह सब एक भूमिका लेख में संभव नहीं। विस्तार पर अकुंश और ज्वलंत समस्याओं को केन्द्र में रखने के उपरांत अनेक महत्वपूर्ण गीत छूट रहे हैं। गीत जो ऋतुओं, त्योहारों और रिश्तों की रागात्मक और आत्मीय ऊष्मा-ऊर्जा से आप्लावित हैं, सभी नवोन्मेषी हैं। सभी गीतों में अद्भुत विम्बधर्मिता है। ‘पत्थर-सी रोटी’, ‘समय सुई है’, ‘बाज़ार-समंदर’, ‘सपनों की पैंजनिया’, ‘सूरज एक चुकन्दर’, ‘छल की गाँठ’, ‘सुहागिन का टोना’, ‘पोटली का मोती’, ‘खुशियों की क्रीम’ और ‘दुःखों का दही विलोना’ जैसे प्रयोगों की द्युति इन गीतों की प्राणशक्ति बन गई है। 
 
आज वैश्विक पटल पर बड़े सर्जकों की जो चिंताएँ हैं उनसे अलग नहीं हैं चिताएँ जो इन गीतों में उठाई गई हैं। इसके बावजूद शिल्प-शैली में सबसे अलग होकर स्वनिर्मित मार्ग पर चला है कवि। कॉमन लय और कॉमन कथ्य से समझौता न करते हुए मौलिक और परिपक्व दृष्टि के परिचायक हैं ये गीत। लोक तथा जन और प्रगतिशील भाषा का समन्वय भाव है कवि का भाषा-मुहावरा। उसका प्रयत्न श्लाघनीय है। यह प्रयत्न सायास न होकर अनायास ही है, जैसे अनायास होती है बच्चों की सोच। उनकी सोच में संसार अपेक्षाकृत सहायक नहीं बन पाता। बाल्यावस्था संसारिकता से अनभिज्ञ होती है। साहित्य के क्षेत्रा में एक युवा रचनाकार की यही स्थिति होती है। हालांकि संग्रहीत गीत, कवि की अध्ययनशीलता एवं चिन्तन-मनन के द्योतक हैं। परिवेश को उसने भी खुली आँखों से देखा, भुगता है। पर इनमें साहित्य का छाद्मिक चातुर्य नहीं, निर्दोष मन की झलक है। यही झलक पाठकों की दिलचस्पी बनेगी। वैसी ही दिलचस्पी जैसे कभी गाते हुए ‘सॉलिटरी रीपर’ को सुनने के लिए ठिठक कर खड़े हो गये थे कवि विलियम वर्ड्सवर्थ। 
 
एक बात और कहना चाहूँगा कि गीत रचना शब्दों की मितव्ययी होती है। अवनीश चैहान के गीत इस तथ्य के प्रमाण हैं। आकार-प्रकार में छोटे-छोटे अर्थ गुंजलक हैं ये। संख्या भी बहुत कम, मात्रा 44 तक ही पहुँच पाती है। आपको ये सारे अर्थ-गुंजलक लघुता में विराटता का बोध् कराने वाले लगेंगे। वस्तु यदि सघन होकर केन्द्रित होगी तो उसकी अर्थ-वीथियाँ हमें दूर-सुदूर तक ले जाएंगी। निम्न उदाहरण से उक्त कथन ज्यादा स्पष्ट होगा- ‘ग़रीबी में जुड़े थे सब / तरक्की ने किया बेघर।’ 
 
आज तेजी से दुनिया बदल रही है। शब्द संकट भी गहरा रहा है। चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। सभी का विकल्प एक ही है। नई-नई सर्जना हो, उसकी स्थापना हो। आलेख की शुरुआत में डॉ विमल की नई स्थापनाओं का उल्लेख हुआ है। वैसा साहस हमारा समस्त बुद्धिजीवी समाज दिखा सके तभी ‘टुकड़ा कागज़ का’ जैसी समर्थ कृतियों की वास्तविक सार्थकता सिद्ध हो सकेगी। 
 
मेरा मानना है कि साहित्य में भावुक सत्य ही साहित्य की मौलिक उद्भावना होती है। मेरा यह भी मानना है कि किसी युवा मन का प्रारम्भिक शब्द-श्रम और तपश्चरण उसके भावोत्कर्ष की परिणति होती है। अतः ऐसे शब्द-साधक को अग्रजों-आचार्यों का वरदीय नेहाशीष मिलना ही चाहिए। विश्वास है कि ‘टुकड़ा कागज़ का’ का प्रकाशन हिन्दी साहित्य के क्षितिज पर अपनी सूर्योदयी भूमिका निभाएगा। बस इतना ही। 
पुस्तक: टुकड़ा कागज़ का 
              (गीत-संग्रह) 
ISBN 978-81-89022-27-6
कवि: अवनीश सिंह चौहान 
प्रकाशन वर्ष: प्रथम संस्करण-2013 
पृष्ठ : 119
मूल्य: रुo 125/-
प्रकाशक: विश्व पुस्तक प्रकाशन  
304-ए,बी.जी.-7, पश्चिम विहार,
नई दिल्ली-63 
वितरक: पूर्वाभास प्रकाशन
चंदपुरा (निहाल सिंह, 
इटावा-206127(उ प्र) 
दूरभाष: 09456011560
ई-मेल: abnishsinghchauhan
@gmail.com  


पुस्तक: टुकड़ा कागज़ का (गीत-संग्रह) 
ISBN 978-93-83878-93-2
कवि: अवनीश सिंह चौहान 
प्रकाशन वर्ष: द्वितीय संस्करण -2014 (पेपरबैक)
पृष्ठ : 116
मूल्य: रुo 90/-
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर
Phone: 0141-2503989, 09829018087
 
Book: Tukda Kagaz Ka (Hindi Lyrics)
ISBN 9978-93-83878-93-2
Author: Abnish Singh Chauhan
First Edition: 2014 (Paperback)
Price: 90/-
Publisher: Bodhi rakashan, 
Jaipur, Raj, India.

 
 
वीरेन्द्र आस्तिक 
एल-60, गंगा बिहार 
 
 
 

Tags: Tukda Kagaz Ka,  Dr Abnish Singh Abnish Singh Chauhan Hindi Literature Poetry Poets, Novelists, Writer 

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Saturday, 24. December 2016 - 12:56 Uhr

Abnish Singh Chauhan


abnish-singh-chauhanDr Abnish Singh Chauhan (1979) is a bilingual poet, critic, translator and editor (Hindi and English). His significant books include Swami Vivekananda: Select Speeches, Speeches of Swami Vivekananda and Subhash Chandra Bose: A Comparative Study, King Lear : A Ctritical Study, Functional Skills in Language and Literature, Functional English, Writing Skills and The Fictional World of Arun Joshi: Paradigm Shift in Values. His deep interest in translation prompted him to translate thirty poems of B S Gautam Anurag under the title Burns Within from Hindi into English and some poems of Paddy Martin from English into Hindi. Besides Harivansh Rai Bachchan Yuva Geetkar Samman (2013) for his Hindi poetry collection Tukada Kagaz Ka from Uttar Pradesh Hindi Sansthan, Lucknow, U.P., he is the recipient of Pratham Kavita Samman (2011) from Kavita Kosh (www.kavitakosh.org), Book of the Year Award (2012) from the Think Club, Michigan, USA, Srajnatmak Sahitya Puraskar (2013) from Rajasthan Patrika, Jaipur, Rajasthan, Navankur Puraskar (2014) from Abhivyakti Vishwam, Sharjah, UAE, etc. He also edits Creation and CriticismInternational Journal of Higher Education and Research and Poorvabhas. He resides at F-338, Prem Nagar, Linepar, Majhola, Moradabad-244001 (UP) India and can be contacted at abnishsinghchauhan@gmail.com.

 


ravipachamuthu-31-1472657950Dear  Mr. Chauhan,

 
I am delighted to see your mail depicting the "Ahmadabad International Literature Event 2016" and your participation on behalf of the University.
 
My heartiest congratulations on your inspiring participation with many leading Literary personalities in the event.
 
My support and arrangements would ever be there for to bring more and more honor to our university.
       
I am so proud of you for setting your sight high and making every efforts to accomplish the task
                             
You are a valued member of our team and I truly appreciate your contribution once again 
 
Wishing you all the Best.
 
- Shri Ravi Pachamoothoo
Chancellor, SRM University Delhi-NCR, Sonepat, Haryana
 

umaji-pose''Meet this silent warrior, a grass root litterateur, super star bilingual author, a highly respected and popular professor of English whose books have been prescribed in the syllabus of many Universities and who earns handsome amount of royalty annually from his books from long back, an unassuming 38 year old Dr. अवनीश सिंह चौहान (Abnish Singh Chauhan) - a very resourceful person with strong network in literary world around the globe - a man to look upto for any assistance. ''
 
- Mr Umashankar Yadav
Festival Director- AILF, Ahmedabad
 

pmgaur
"Dear Dr. Abnish ji, my heartiest congratulations to you for your inspiring participation in AILF2016, Ahemadabad. It is ur great achievement and a rare honour for us and SRMU that u represented there well and interacted with dignified dignitaries of the world. I pray to  Almighty God for u  that may u avail more and more opportunities for such worldwide literary functions. With deepest blessings and best wishes." 
 
- Dr P M Gaur
Prof & HOD- Hindi
SRM University, Sonepat, Haryana
 
 

veerendra-aastikसंग्रह के भीतरी अवलोकनों के बीच-बीच में एक पाठक की उत्कंठा यह जानने की अवश्य रहती है कि यह कवि अपने संग्रह के बाहर कैसा होगा। मेरा मानना है कि समाज का आदर्श वही कवि बनता है जिसका व्यक्तित्व और कृतित्व पारदर्शी हो। व्यक्ति के अंतर्वाह्य जगत को उसकी प्रतिभा ही संतुलित करती है। कहा जाता है कि प्रतिभा व्यक्ति में जन्म के साथ आती है। और परिवेश संस्कारी हो तो साधनाएँ बचपन से ही शुरू हो जाती हैं। सन् 1893 में शिकागो (अमेरिका) में युवा विवेकानंद ने उद्भुत भाषण देकर विश्व में हिन्दुत्व का परचम लहरा दिया था। उन्तीस वर्षीय पी॰बी॰ शैली ने अज्ञात लेखक के रूप में ईश्वर के विरुद्ध हो जाने को आवश्यक मानते हुए एक किताब लिखी और छपवा डाली। महत्वपूर्ण प्रसंग यह है कि उस कृति की ख्याति ने उन्हें ऑक्सफोर्ड से निष्कासित करवा दिया। 15 वर्षीय नेपाली अपने पहले ही कवि सम्मेलन से विख्यात हो गये थे। मंच पर उपस्थित कथा-सम्राट प्रेमचंद्र ने कहा था- ‘बरखुरदार, कविता क्या पेट से सीखकर आए हो।’ यह सब प्रतिभा के ‘चरैवेति’ प्रभाव के अंतर्गत है। जैसे जल-समूह की गत्यात्मक शक्ति धरा फोड़ लेती है, वैसे ही प्रतिभा मील-स्तम्भ बनाती जाती है और आगे चलती चली जाती है। एक और सूत्र कथन याद आ रहा है। डॉ शन्तिसुमन के गीतों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कभी डॉ विजेन्द्र नारायण सिंह ने कहा था- ‘प्रतिभा की एक पहचान यह है कि वह विकसनशील होती है।’ हमारे प्रिय अवनीश ऐसे ही प्रतिभाशाली कवि-लेखक हैं। एम॰ फिल॰ (अंग्रेज़ी) करते ही मात्र 24 साल की उम्र में एक अंग्रेज़ी किताब (स्वामी विवेकानंद: सिलेक्ट स्पीचेज) लिख डाली, जो परास्नातक पाठ्यक्रम में कई विश्वविद्यालयों में पढ़ी-पढ़ाई गयी। एक विश्वविद्यालय में कार्यरत् अंग्रेजी- प्राध्यापक अवनीश चैहान हिन्दी के क्षेत्र में आए तो मात्र 6-7 साल की अवधि में ही जो भी गद्य-गीत लेखन और संपादन कार्य किया, वह सराहा गया। आजकल वे अनेक छोटी-बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में छप रहे हैं। गत 2-3 वर्षों में इण्टरनेट पर ‘पूर्वाभास’ जैसी पत्रिका निकालकर उन्होंने विशेष ख्याति अर्जित की है। हर्ष का विषय ही है कि इस कवि की कार्यशैली विश्वस्तर पर भी सम्मानित/ पुरस्कृत हो चुकी है। साहित्यिक दौड़ में  अभी तो इस धवक ने दशक भी पार नहीं किया किन्तु उसकी कविता का यह वामन रूप मेरे जैसे उम्रदराजों को चकित कर देने के लिए काफी है। इस अवांतर प्रसंग के बाद हम पुनः संग्रह के भीतरी लोक में लौटते हैं।
 
- Mr Veerendra Astik
Renowned Hindi Poet & Critic
L-60, Gangavihar, Kanpur, U.P.
 

Tags: Dr Abnish Singh Abnish Singh Chauhan Literature Festival, Authors, Media, Cinema, Actors MEDIA Professor Poet Critic Editor 

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Saturday, 24. December 2016 - 12:54 Uhr

Speeches of Swami Vivekananda and Subhash Chandra Bose: A Comparative Study by Abnish Singh Chauhan


speechesSpeeches of Swami Vivekananda and Subhash Chandra Bose: A Comparative Study by Abnish Singh Chauhan


Abnish Singh Chauhan. Speeches of Swami Vivekananda and Subhash Chandra Bose: A Comparative Study. Bareilly: Prakash Book Depot, 2006. Pp. 118. Price: Rs. 200/- ISBN: 978-8179771490.


  

Reviewed by Sudhir K. Arora

 

Abnish Singh Chauhan’s Speeches of Swami Vivekananda and Subhash Chandra Bose: A Comparative Study deciphers the speeches of Swami Vivekananda and Subhash Chandra Bose to trace out the thought patterns, revealed through the language, and thus to find out the points of similarities and dissimilarities for the final evaluation without harming the reputation of the two.  

 

‘Introduction’ introduces the term ‘rhetoric’ in detail, and peeps into Swami Vivekananda’s and Subhash Chandra Bose’s biographical details that paved the way for their magical art of oratory. The chapter ‘Cultural Awareness and Patriotism’ reveals Swami Vivekananda as the representative of “the very soul of Hinduism and its spiritual grandeur”, and highlights him as the preacher of tolerance, equality and cooperation among the people of all faiths. It also demonstrates the various phases of Indian patriotism including religious movements, cultural awareness, and the birth and the journey of Indian National Congress. History of freedom movement is incomplete without the contribution of Subhash Chandra Bose who, as a freedom fighter, filled the confidence and vigour among the Indians and, thus, shook the very foundation of the British imperialism. The chapter ‘Analysis of the Use of Spiritual Power and Physical / Military Power’ analyses the spiritual power in Vivekananda and military power in Subhash Chandra Bose and also reflects over the use of these powers in making them the symbol of service to the humanity, and the symbol of flaming patriotism and dynamism respectively. Both of them were rational enough to have understanding and a grasp over the situation. Both travelled the foreign lands and shared the problems of India on the international scene. They differed in mediums but shared the same goal—the upliftment of the motherland.  The endeavours of I. N. A. to make India free and the clarion call for unity, faith and sacrifice reflect Bose’s boldness and organisational skill. While appreciating Bose, the author writes: “Morally, spiritually and intellectually, he walked into the steps of Swami Vivekananda, in statesmanship, administrative ability and catholicity of outlook, he worked like Akbar, but above all in leadership and as a military genius he fought like Shivaji.” The chapter ‘Use of Language’ demonstrates the art of oratory, revealed in language and style. Swami Vivekananda proved his oratorical skill and literary art in the Chicago address. His selection of words is excellent and balanced. His sentences are fused with “explanatory clauses, musical phrases, specific clichés and denotative words.” Shubhash Chandra Bose uses electrifying language to exhort the masses. Appropriate phraseology, idiomatic expression and the right choice of words mark his discourses which become quite familiar, emphatic and persuasive. While writing on the language of Subhash Chandra Bose, the author writes: “His sentences don’t have so much of compact finish as those of Swami Vivekananda, yet they are noteworthy...He often prefers a lose structure. His sentences contain words, phrases and clauses in formal balance.” He binds circumstances with effective words in the style which reveals the tone of patriotic mobilization that impresses the masses. The chapter ‘Conclusion’ sums up the ideas, expressed in the previous chapters.

 

The book is in hardbound with affordable cost. It is a real contribution in the field of knowledge regarding the speeches of Swami Vivekananda and Subhash Chandra Bose. It will inspire scholars, teachers, and even general readers to make a further study on the two great men of India. It gives a satisfying pleasure to the reader who cannot help without appreciating the excellent and convincing way of the narration of the author. Kudos to the author Abnish Singh Chauhan for making the comparative study in such an authentic manner and the publisher, Prakash  Book Depot for bringing the book at such affordable price.

 


 

sudhir-photoThe Reviewer:

 

Dr Sudhir K. Arora (b.1968) teaches English at Maharaja Harishchandra P. G. College, Moradabad affiliated to M. J. P. Rohilkhand University, Bareilly. He has several significant publications to his credit including Aravind Adiga’s The White Tiger: A Freakish Booker and Cultural and Philosophical Reflections in Indian Poetry in English in Five Volumes. 


 Courtesy: Creation and Criticism. http://creationandcriticism.com/115.html


Tags: Dr Abnish Singh Abnish Singh Chauhan 

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Saturday, 24. December 2016 - 12:51 Uhr

William Shakespeare: King Lear by Abnish Singh Chauhan


king-lear-by-abnish---copy---cWilliam Shakespeare: King Lear by Abnish Singh Chauhan


Abnish Singh Chauchan.  William Shakespeare: King Lear. Faizabad: Bhavdiya Prakashan, 2016.  First Published in 2005. Pp. 608. Price: Rs.148/- (Paperback). ISBN: 978-9385893018.


  

Reviewed by Madhu Bala Saxena

 

Dr Abnish Singh Chauhan, without any break, is increasing the number of quality books by his creative talent both in English and Hindi languages. ‘William Shakespeare: King Lear’ is one such book of Dr Singh. He has interpreted this book keeping its utility to the students of English literature and lovers of Shakespeare’s dramas.

 

The close study of the book exhibits that King Lear, one of the most powerful tragic plays of William Shakespeare, has a double plot— a main plot and a sub-plot. The main plot deals with the story of King Lear and his three daughters— Goneril, Regan and Cordelia, whereas the sub-plot presents the tale of the Earl of Gloucester and his two sons— Edgar and Edmund.  Both the plots clearly communicate the theme of filial ingratitude— Lear is first duped by the false praise of his two eldest daughters for usurping the whole kingdom and then tortured and led to insanity by their wicked behaviours, while Gloucester is deceived by his bastard son Edmund, which becomes the cause of parental enmity and bitterness in the long run. Concomitantly, the disheritance of Cordelia, the banishment and servile existence of Kent, Edgar’s aching journey on the heath in the state of feigned madness, the terrible sufferings of King Lear and the inhuman blinding of old Gloucester sadly take place in its dramatic world leading to the unexpected deaths of innocent Cordelia— the only daughter who comes to rescue her father, gullible Gloucester and aged Lear at the end of the play.

  

Knowing the complexities of the plots and other essentials of the play, Dr Abnish Singh has wisely divided the book into four parts. In the first section, he has given the general introduction, which includes life, age, works and art of William Shakespeare. The second section introduces the readers with drama King Lear— its date of composition, sources, duration of action, dramatis personae, plot-construction and act-wise summary along with the critical comments of scholars on the drama. Both these sections are very important for the students as they provide general knowledge about William Shakespeare, the greatest English dramatist of the world and his dramatic art; because without being acquainted with the writer’s life, literary output, artistic caliber and so on, a student cannot understand his book. In the next portion of the book, a prudent study of the book King Lear has been done with text, notes and paraphrase in English and translation in Hindi. The systematic interpretation of the drama— first text, then meaning of difficult words, then paraphrase in English and in the last the Hindi version is really appreciating and engaging too.  Allusions and references have also been included in the book for the better understanding of the play. After that, in the next part, a critical interpretation of all the five acts and scenes has been done. Some very important explanations, important long questions, short answer type questions, multiple objective type questions and bibliography have been attached in the end of the book.

 

The book has been written systematically in an easy, straightforward and lucid language. The readers will neither have any problem in understanding the drama, nor will wander in search of a helping hand that can explain it. Everything is available in the book. As far as the cost of the book is concerned, it is very low-priced, which can be paid by all. Therefore, the book deserves its place in the libraries of all schools (CBSE, ICSE, and States Boards), colleges and universities of the country. There is much need of such books now-a-days.  I wish that Dr Abnish must continue his mission of penning such rare books so that they might reach to the scholars of English language and literature.

 


 
mb-saxenaThe Reviewer:

 

Dr. Madhu Bala Saxena (1953) worked as Professor and Head of English Department of IFTM University, Moradabad and Associate Professor and Head of English Department of M.H.P.G. College, Moradabad, U.P. She is M.A. in Sanskrit and English and her doctoral degree in English is on ‘Treatment of Human Relations in the Novels of Somerset Maugham.’ She has been writing research papers and book reviews for various journals and magazines and guiding research scholars of English Literature for the last thirty five years. Her main interest lies in Indian Literature in English, particularly in Indian English Fiction. She can be contacted at madhumh53@gmail.com.


 Courtesy: Creation and Criticism. http://creationandcriticism.com/116.html


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Saturday, 24. December 2016 - 12:46 Uhr

The Fictional World of Arun Joshi: Paradigm Shift in Values by Abnish Singh Chauhan


the-fictional-world-of-arun-joThe Fictional World of Arun Joshi: Paradigm Shift in Values by Abnish Singh Chauhan


Abnish Singh Chauhan. The Fictional World of Arun Joshi: Paradigm Shift in Values. New Delhi: Authorspress, 2016. Price 1200. Pages 268+xi. ISBN 978-93-5207-112-8 


  

Reviewed by Madhu Bala Saxena

 

Dr Abnish Singh Chauhan's The Fictional World of Arun Joshi:  Paradigm Shift in Values is his outstanding critical study in which he has explored Arun Joshi’s novels— The Foreigner, The Strange Case of Billy Biswas, The Apprentice, The Last Labyrinth and The City and the River along with The Survivor (a collection of his short stories) depicting themes and characters with paradigm shift in values in the present world.

 

The book consists of eight chapters which have been entitled (1) Introduction: A Snapshot of Arun Joshi’s Fiction, (2) The Foreigner: Sense of Guilt and Alienation, (3) The Strange Case of Billy Biswas: Levels of Life, (4) The Apprentice: Industrial Impact, (5) The Last Labyrinth: Existential Struggle, (6) The City and the River: Social Disparity, (7) The Survivor: Moods and Manner, and (8) Conclusion: Paradigm Shift in Values.  Dr. Abnish has indicated the name of the theme of each and every fictional work with its title so that every reader of the book may come to know it at a glance.  

 

In the first chapter— ‘Introduction: A Snapshot of Arun Joshi’s Fiction’, Dr Abnish explains the term ‘Paradigm shift’, which means successive transition from one paradigm to another via changes in life and society. After that he highlights the significance of values in human life. This chapter is of utmost importance because it contains the definition of the term paradigm, values, kinds of values and the history of values with illustrations from Indian scriptures like the Vedas, the Upanishads, the Bhagvad-Gita and the Ramayana as well as the philosophies of Swami Vivekananda, Kabir and other saints and intellectuals. All these spiritual books, saints and philosophers unanimously accept that without values— honesty, truthfulness, modesty,  benevolence, purity and self-esteem, a person cannot get peace and calm in the life however affluent, powerful and resourceful he may be. Besides, the chapter also inculcates a brief life–sketch of Arun Joshi, his academic and literary career and his motives of writings in order to instill social, cultural, moral and spiritual values in the people of the contemporary age through the examples of the protagonists of his fictional world.

 

In the second chapter— ‘The Foreigner: Sense of Guilt and Alienation’, Dr. Abnish highlights the theme of the novel and clarifies that the sense of guilt is felt by a person when he realizes the futility of false values and the utility of true values. A person feels rootless and alienated in the foreign land, because there he finds values and culture quite different from those of his motherland. And, therefore, he loses his peace and calm in the long run of his life resulting in the sense of guilt and alienation. This sense of guilt and alienation has been illustrated by the characters like Sindi, June, Babu and Mr Khemka.

 

In the third chapter— ‘The Strange Case of Billy Biswas: Levels of Life’, the writer reveals three levels of life of Billy Biswas, the protagonist. First— the slum life, the second— affluent level of life, the third one— subsistence level of life i.e. value level of life. The hero of the novel achieves the true goal of life because he makes no compromise with the values of modern society in which morality is sacrificed for material pleasure which is transitory. The message is that for hale and hearty life, a man should move on the path of true values as practiced in the Maikala Hills of the novel.

 

In the fourth chapter— ‘The Apprentice: Industrial Impact’, the author has discussed paradigm shift in Gandhian values along with other values in the modern society. The father of Ratan, the protagonist struggled for Gandhian values, but the son practices corrupt ways of life. Therefore, truth is replaced by lie, honesty by dishonesty, virtue by vice, selflessness by selfishness in the fictional world. Money is considered everything, which rules the age of industrialization. In spite of it, if someone repents on his past misdeeds by doing some good work or social service, he may get peace of mind as in the novel, Ratan, the protagonist repents by polishing the shoes of others and wants to purify himself. He also knows that self condemnation is the best repentance and, thus, he overcomes his mistakes and rises above by confessing his misdeeds. The message is that if one reforms oneself, the world would reform itself.

 

In the fifth chapter— ‘The Last Labyrinth: Existential Struggle’, the author points out Arun Joshi’s message to the masses that life is a labyrinth and a man has to struggle throughout his life in search of mental peace and pleasure. In order to attain them he must follow healthy moral and spiritual values of life and society. Moreover, a man can attain the highest degree of manhood by his collaborating and cooperating nature.

 

In the sixth chapter— ‘The City and the River: Social Disparity’, Dr Abnish seems to agree with the novelist that traditional values play a vital role in human life as they provide mental harmony and happiness. The story of the novel is a struggle between the aristocrat and the proletarian, between the governor and the governed between the tradition and the modernity between the spiritualism and the materialism. In this fictional world, life has become restless and difficult. That is why the shift from unhealthy modern values to healthy traditional values becomes mandatory.

 

The seventh chapter— ‘The Survivor: Moods and Manners’ presents the author’s exploration of Arun Joshi’s stories— Survivor, Gherao,  Harmik, The Home Coming, The Frontier Mail is Gone, The Servant, A Trip for Mr. Lele, The Only American From Our Village, etc  from critic’s point of view. Arun Joshi’s social realism with paradigm shift of values due to industrialization, urbanization and globalization, (mostly seen in the high profile society), narrative techniques and art of characterization leave the footprints of his master craftsmanship. His stories exhibit a common message that all the patterns of values— social, cultural, moral, human and spiritual, provide mental peace and contentment and their ignorance may bring discontentment and decadence to all and sundry.

 

In the last chapter, the author concludes his criticism of the fictional world of Arun Joshi and briefly presents all the important aspects of his novels and short-stories with special reference to paradigm shift in values.

 

To sum up, the book is the proof of Dr. Abnish Singh Chauhan’s deep and accurate knowledge of the fictional works of Arun Joshi. His critical appraisal of Arun Joshi’s novels and short-stories from a thematic point of view is worth appreciating. His critical insight, acumen, objectivity, rationality and manner of presentation deserve full praise and appreciation. The book is, no doubt, a reference book for the research scholars and fascinatingly readable by the lovers of Indian Fiction in English.


 

The Reviewer:madhu-saxena

 

Dr. Madhu Bala Saxena (1953) worked as Professor and Head of English Department of IFTM University, Moradabad and Associate Professor and Head of English Department of M.H.P.G. College, Moradabad, U.P. She is M.A. in Sanskrit and English and her doctoral degree in English is on ‘Treatment of Human Relations in the Novels of Somerset Maugham.’ She has been writing research papers and book reviews for various journals and magazines and guiding research scholars of English Literature for the last thirty five years. Her main interest lies in Indian Literature in English, particularly in Indian English Fiction. She can be contacted at madhumh53@gmail.com.


 Courtesy: Creation and Criticism. http://creationandcriticism.com/116.html


 


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